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हम सँवित मात्र है


वामन- विष्णु, जीव-शिव, परिछिन्न-व्यापक, कार्य-कारण

रुई कारण है और धागा कार्य है लेकिन कपड़े को देखो तो कपड़ा कार्य है और धागा कारण है । ठीक है न? धागा निकाल दो तो कपड़ा नहीं रहेगा । कार्य को पकड़ो तो कारण समझ में आ जायेगा और कारण को पकड़ो तो कार्य की पोल खुल जायेगी ।

कारण को पकड़ा तो कार्य उसकी सत्ता के बिना नहीं है । धागे को समझ गए तो कपड़ा उसकी सत्ता के बिना नहीं है । तो ये शरीर कार्य है और उसका मूल कारण वामन-विभु… और शरीर को पकड़ते-पकड़ते गये तो भी वही दिखेगा ।

आँख किससे देखती है? कान किससे सुनते है? मन किससे सोचता है? तो भी कारण में पहुँच जायेगा और कारण को पकड़ा तो कार्य का पता चल जायेगा ।

तो कार्य है खेल-लीला और कारण है सार । कारण है आत्मा…  जहाँ से  ‘मैं-मैं’ फुरता है लेकिन फिर गंदगी भर देते है.. ‘मैं सेठ हूँ, मैं दुःखी हूँ , मैं सुखी हूँ… गंदगी भर दी । सुखी-दुःखी मन होता है । लोभ की अधिकता से, प्रेम धन में होता है तो लोभी बनता है, शरीर में होता है तो अहंकारी बनता है, परिवार में होता है तो मोही बनता है, चिंता में होता है तो चिंतित होता है, रिश्ते-नाते-दोस्त में होता है तो मित्र-शत्रु बनता है लेकिन वो प्रेम मूल में जाये तो परमात्मा ही है । कितना सरल ज्ञान, कितना ऊँचा ज्ञान! ये पहली बार सुन रहे हो तुम लोग ।


कुछ लोग मंदिरों में, कुछ लोग तीर्थों में, कुछ लोग समाज को बदलने में, कुछ सुधारने में… अरे भाई! मूल में आओ न ! बाद में सब करना ! बेटे के विवाह-शादी के चक्कर में पड़े हैं कोई, कोई बहू लाने के चक्कर में तो कोई बेटा लाने के चक्कर में, कोई दुश्मन को ठीक करने के चक्‍कर में, कोई समाज को सुधारने के चक्कर में । वे चक्कर खाते ही रह जाते है । पहला काम यही है, उस वामन-विभु को पाओ ! जिससे सब होता है, जो सबमें बैठा है, जो सभी रूप में है।

मैं ये व्यक्ति हूँ, फलाना… ये भी बँधन है । ये मेरा समाज है, समाज को ठीक करूँ… ये भी फँसते है । जाति को ठीक करूँ, भूतकाल ऐसा था, भविष्य ऐसा बनाऊँ, संस्कृति का निर्माण करूँ, अपनी पार्टी को ऊँचा ले जाऊँ… सारी पार्टियाँ जिससे होती है उधर आजा न! हे हरि……

तू सोने की लंका भी बना लेगा न, तो भी रोना पड़ेगा ! दुःखी होकर जाना पड़ेगा । रावण का इतिहास देख ले । ये सुधार कर लेंगे, ये प्रगति कर लेंगे… नेताओं को तो… अपना उल्लू सीधा करने के लिए पब्लिक को उल्लू बनाते रहेंगे लेकिन सयाने आदमी समझ जाते है कि क्या कर लेगा नेता… ये कर देगा… वो कर देगा… अरे ! बिजली का बिल भी कम नहीं कर सकता,  हाऊस टैक्स भी माफ नहीं कर सकता तो सोने का हाऊस कहाँ-से बना के देगा? और
सोने का हाऊस बनाने के बाद भी रावण की प्रजा दुःखी थी तो तुम कौन-से सुखी हो जाओगे? ऐसा प्राइम मिनिस्टर आ जाये कि सबको सोने का घर दे देवे… हालाँकि संभव ही नहीं है फिर भी उस व्यापक विभु को जाने बिना दुःख का अंत नहीं होता और उसको जान लिया तो मौज हो गई । शबरी भीलण के पास सोने की लंका नहीं थी, मतँग गुरू के चरणों में सत्संग सुना… रामजी उसके जूठे बेर खा रहे हैं और सोने की लंका वालों को तीरों का निशाना बनाकर भेज दिया । इतनी समझ हो तो बस… सत्संग में आदमी सब छोड़कर लग जावें ।

तो ‘व्यक्तित्व’ का बँधन, ‘समाज’ का बँधन, ये ‘बनने’ का बँधन, ‘मिटाने’ का बँधन… ये सारे बंधन… कोई बोले फलाना धर्म श्रेष्ठ है, कोई बोले फलाना मजहब श्रेष्ठ है… उनको करने दो दिमाग की कसरत, तुम तो आ जाओ अपने दिलबर में बस!

तो वो क्या है? …सँवित मात्र है ।  पंचदशी ग्रँथ है, उसमें आरम्भ में उसका वर्णन किया है… परमात्मा क्या है? …सँवित मात्र । जहाँ से फुरना होता है, विचार उठते हैं । फिर जैसा गुण, जैसा रंग । उठ-उठ के बदल जाते है फिर भी ज्यों-का-त्यों है वो, सँवित-मात्र आत्मा है । वास्तव में हम वो ही है सँवित लेकिन मान बैठे हैं अपने को शरीर । सँवित का संबंध टूटे तो शरीर को जलाने ले जाएँगे, दफनाने ले जाएँगे! और सँवित फिर दूसरे शरीर में आयेगा या स्वर्ग में जायेगा… ॐ… ॐ… ॐ… । समय की धारा में तो सब बड़े-बड़े पीर-पैगम्बर भी आ-आकर चले जाते है फिर भी सदा रहता है वो ही सँवित-चैतन्य ।

मूसा के समय ईसा नहीं थे, ईसा के समय मोहम्‍मद कहाँ थे? बुद्ध के समय ईसा-मूसा दोनों नहीं थे और महावीर के समय बुद्ध नहीं थे लेकिन वो सँवित चलानेवाला तो सदा था, सभी में था, है, रहेगा।

जब सतयुग का आदि था तो उपदेशक भगवान ब्रम्हाजी थे आचार्य । कल्प के 
आदि में भगवान विष्णु आचार्य बन गये और महाप्रलय के समय भगवान शँकर जगद्गुरू बने थे लेकिन अभी उन पोस्टों (पदों) पर नहीं है लेकिन ‘ये’ पोस्ट (पद) वाला तो सभी में अभी भी है । जो बड़े प्रचारक बुद्ध, शँकर आदि हुए, उनकी आकृतियाँ भी नहीं है लेकिन उनको प्रेरणा देनेवाला, चलानेवाला अभी भी सबके हृदय में है ।

ऋषिकेश में चँद्रभागा नदी बहती है, चँद्रभागा गँगा में मिलती है । चँद्रभागा के तट पर एक महात्मा की कुटिया थी । अखण्डानन्द मिलने गये, प्रणाम किया, श्रद्धा से बैठे ।

बोले – ‘महाराज! मैं जीवात्मा हूँ।’

…अरे!, बोले- जीवात्‍मा हूँ – ये सुनकर मानता है, जीवात्मा हूँ -ये भाव जहाँ से आते है उसके मूल में देखो, कौन है? मैं बनिया हूँ, मैं फलाना हूँ , मैं साधु हूँ… अरे! सब विष्णुस्वरूप हो, सँवित हो! आनंद रूप हो, ज्ञानस्वरूप हो, चैतन्यरूप हो ।

बोले- ‘महाराज! मैं नहीं जानता हूँ ।’

बोले- ‘नहीं जानने के भी साक्षी हो, नहीं जानने को भी तो जान रहे हो, ऐसे चैतन्य हो । अंतःकरण की शुद्धि हो जाती है, कर्मों की शुद्धि, भावों की शुद्धि, ज्ञान की परम शुद्धि… ऐसा ज्ञान है । ॐ ॐ प्रभुजी ॐ… प्यारेजी ॐ… अंतर्मात्‍मा ॐ… ये आधारशिला है, जप करते-करते रात को सो जाये तो फिर नींद में भी जप होने लगता है ।

रात के दो बजे थे, चारों तरफ सन्नाटा था और ध्वनि सुनाई पड़ी । देखा, ध्वनि कहाँ से आ रही है? धीरे-धीरे देखा कि महाराज के शरीर से ही गुँजन हो रहा है और महाराज गहरी नींद में है । उनके श्वाँस नहीं चल रहे है । आधारशिला जैसा चिंतन करके जाओ तो फिर वैसे ही चला देती है तो सोते समय कभी चिंता लेकर नहीं सोना चाहिये । कभी बीमारी का भाव लेकर नहीं सोना चाहिये ।

ॐ आनंद… ॐ शांति… ॐ प्रभुजी… ॐ प्यारेजी… ॐ… ॐ…आज से ही शुरू करो । ऐसा बड़ा भारी लाभ होगा कि सारे जन्मों की कमाई एक तरफ और ये दस हफ्ते की कमाई तुमको आगे ले जायेगी, सारे जन्मों की कमाई से आगे ! खाली दस हफ्ता । सत्तर दिन हुए और क्या हुआ? फायदा हो तो बढ़ा देना, नहीं हो तो सत्तर दिन जितना टाइम लगाया उतना मेरेको घर पे बुला लेना, मैं आपके बर्तन माँजूंगा, घर का काम करूँगा, दुकान का काम करूँगा, जहाँ भी बिठाओगे वहाँ सफल होकर दिखाऊँगा । ईमानदारी से करोगे तो मुझे आना नहीं पड़ेगा और झूठ-मूठ लिखोगे तो भी नहीं आऊँगा । हम शर्त ऐसी रखते है, फँसें नहीं ।

ईमानदारी से करोगे तो फायदा होगा और बेईमानी से लिखोगे तो मैं आऊँगा ही नहीं । ईमानदारी से करोगे तो फायदा होगा कि नहीं होगा? हाँ, बोले -हमने किया, कोई फायदा नहीं हुआ… तो हम समझेंगे कि आपने तो ऐसे ही मेरे को बबलू बनाने को लिखा है । हरि…. नारायण हरि… ॐ… ॐ…

ॐ प्रभु…  ॐ आधारशिला… ॐ वामन-विभु… । वामन जो सुंदर बना दे, वामन जो छोटा दिखे और पूर्ण हो, बड़ा भी हो, छोटा भी दिख सके वो वामन, विभु भी है और सुंदर बना दे । खाद को कितना सुंदर बना देता है – ‘लीची’ बन गया, ‘आम’ बन गया । सूरज में ऐसा सामर्थ्य भरा है, एक सेकंड में 50 लाख टन कार्बन खींच लेता है धरती से अपना खुराक, फिर धधकती आग देता है और खारे और गटरें जो समुद्र में चली जाती है उसमें से गंगा जल बना रहा है, कैसा है विभु ! ‘गंगाजल’ वहीं से आता है, समुद्र से नहीं आता । ‘बर्फ’ भी पड़ती है तो समुद्र से उठाके । अजब-गजब का खेल है और यहाँ खेल रहा है । यहाँ ‘खून’ बनाता है, वहाँ तू ‘जल’ में से ‘गंगाजल’ बना देता है लेकिन यहाँ तो ‘रोटी’ में से ‘बच्चा’ बना देता है, ‘बापू’ बना देता है । रोटी में से ही तो बनाया ! ‘सेठ’ बना देता है कैसा विभु है! हे हरि.. ‘हरि’ इसीलिए तेरा नाम है, तू हर जगह है, हर दिल में है, हमेशा है, इसलिए तेरा नाम ‘हरि’ भी है और तेरा ही नाम ‘राम’ है कि रोम-रोम में रम रहा है, तेरा नाम ‘राम’ है । ‘शिव’ भी तेरा नाम है, तू ‘कल्याण’ करता है, ‘अकल्याण’ तू सोचता ही नहीं, इसीलिये तेरा नाम ‘शिव’ भी है । ‘अच्युत’ नाम है.. तू अपनी महिमा और सत्ता से कभी ‘च्युत’ नहीं होता। मिनिस्टर-प्राइम मिनिस्टर, राष्ट्रपति सब कुर्सी से ‘च्युत’ हो जाते है, ‘इन्द्र’ भी च्युत हो जाता है ‘इन्‍द्रपद’ से लेकिन हे हृदयेश्वर! तू ‘च्युत’ नहीं होता, तू ‘अच्युत’ है और तेरा ही नाम ‘केशव’ है… ‘क’ माना ‘ब्रह्मा’ में भी ‘तू’ ही है, ‘श’ माना ‘शिव’ में भी ‘तू’, ‘व’ माना ‘विष्णु’ में भी ‘तू’ ।  ‘ब्रह्मा-विष्णु-महेश’ तुझी-से दैदीप्यमान हो रहे है । हे अच्युत, हे केशव, हे हरि !

ये आज का सत्संग पकड़ लो न बस हो गए सारे तीरथ!

मन का नाश करना है तो……


स्वामी शरणानंदजी के एक भक्त थे प्राध्यापक केशरी कुमार । वे अपने जीवन की एक घटित घटना का उल्लेख करते हुए लिखते हैं-

राँची की घटना है । एक वृद्ध वकील साहब स्वामी जी (शरणानंदजी) के पास आये, जो राँची में गाँधी जी के मेजबान थे और जिन्हें राँची वाले प्यार से नगरपिता कहते थे । आते ही बोलेः ″स्वामी जी ! मन अब तक न मरा । कोई ऐसा चाबुक बताइये जिससे मार-मारकर इसे खत्म कर दें ।″

स्वामी जी ने कहाः ″गाँधी जी के मेजबान होकर भी आप मारने की बात करते हैं । बलपूर्वक मारने की जितनी चेष्टा करेंगे, मन उतना ही प्रबल होगा । आप ही की सत्ता से सत्ता पाकर मन आप पर शासन करता है । मन आपका है, आप मन नहीं हैं । अंतः न तो उसे बलपूर्वक मारने की चेष्टा करो, न सहयोग करो । गाँधी जी का अमोघ अस्त्र है ‘असहयोग’ । मन से असहयोग करो । मन के जलूस को देखते रहिये, उसमें शामिल न होइये । बस, मजा आ जायेगा । मुश्किल यह है कि आप चाहते हैं क्रांति और करते हैं आन्दोलन ।″

वकील साहब बोलेः ″महाराज ! आंदोलन और क्रांति तो एक ही चीज है । आंदोलन न करेंगे तो क्रांति होगी कैसे ?″

स्वामी जीः ″नहीं महाराज ! आंदोलन है बलपूर्वक अपनी बात दूसरों से मनवाना और क्रांति है हर्षपूर्वक कष्ट सहकर तपना व स्वयं को बदलना और दूसरे पर प्रभाव होने देना । आप करते हैं आंदोलन और चाहते हैं कि क्रांति हो जाय । आप बदलते नहीं, दूसरों को बदलना चाहते हैं । यह नहीं होगा । मन आप नहीं हैं, मन है ‘पर’ (अन्य), मिला हुआ । आप बदल जाओगे तो मन अपने आप बदल जायेगा । जीवन में क्रांति आ जायेगी ।″

थोड़ी देर सन्नाटा रहा, जिसे भंग करते हुए स्वामी जी आगे बोलेः ‘पर भाई ! आप हैं पढ़े-लिखे और मैं ठहरा पाँचवी तक पढ़ा, बेपढ़ा अंधा (स्वामी जी बचपन में ही दृष्टिहीन हो गये थे । ) बात न रूचे तो स्वीकार न कीजिये ।″

बात निशाने पर लगी और वकील साहब ने कुछ आजिजी से पूछाः ″महाराजः यह मन है क्या ?″

स्वामी जीः ″यह मन है भोगे हुए का और जो भोगना चाहते हैं उसका प्रभाव । भुक्त (जिसका भोग किया गया हो) – अभुक्त के प्रभाव के अतिरिक्त मन कुछ नहीं है । भोग के प्रभाव का नाम मन, भोग के परिणाम का नाम शोक तथा भोग की रूचि का नाम बुराई है । अब आप ही सोचिये कि जब तक कारण का नाश नहीं होगा अर्थात् भोग की रूचि का नाश नहीं होगा तब तक कार्य अर्थात् मन का नाश  होगा क्या  ?″

फिर मेरा नाम लेते हुए बोलेः ″केशरी भाई ! तुम तो साहित्य के प्रोफेसर हो । भक्ति साहित्य में पढ़ा होगा कि राधा जी बेमन हो गयी थीं । क्यों ? क्योंकि उनका अपना कोई संकल्प नहीं रह गया था । उन्होंने मन के अपने सारे संकल्प श्रीकृष्ण को समर्पित कर दिये थे । और हमारा हाल है कि हम सारे संकल्प अपने लिए रखते हैं उनका भार ढोते रहना चाहते हैं और चाहते यह है कि मन का नाश हो जाय । यह असम्भव है ।″

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2020, पृष्ठ संख्या 24 अंक 336

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इक्के ते सब होत है, सब ते एक न होई – पूज्य बापू जी


त्रिलोकी में ऐसी कोई चीज नहीं जो अभ्यास से न मिले लेकिन नश्वर के लिए अभ्यास करते हो तो नश्वर चीज मिलेगी और छूट जायेगी और शाश्वत के लिए अभ्यास किया तो शाश्वत वस्तु मिलेगी, छूटेगी नहीं । शाश्वत के लिए अभ्यास करना बुद्धिमत्ता है ।

‘श्री योगवासिष्ठ महारामायण’ में आता हैः ‘मनुष्य को देह-इन्द्रियों का अभ्यास दृढ़ हो रहा

 है, उससे फिर-फिर देह और इन्द्रियाँ ही पाता है ।’

देह और इन्द्रियों का अभ्यास दृढ़ हो गया न, इसलिए मनुष्य फिर-फिर से उसी जन्म-मृत्यु के चक्र में भटकता है । आत्मा का अभ्यास नहीं हुआ है इसलिए आत्मप्रकाश नहीं होता, नहीं तो इन्द्रियों और शरीर का जो भी काम होता है वह आत्मसत्ता से ही होता है ।

स्टील की कटोरी दिखाकर किसी को पूछाः ″यह क्या है ?″ बोलेः ″कटोरी है ।″

″पहले क्या दिखता है ?″

बोलेः ”कटोरी ।”

नहीं…. पहले स्टील दिखता है, बाद में कटोरी । ऐसे ही पहले ब्रह्म है, चैतन्य है, सुखरूप है, बाद में देह, इन्द्रियाँ, मन किंतु अभ्यास इनका हो गया तो वह ढक गया । व्यक्ति को तरंगे दिखती हैं और पानी की पहचान भूल गया !

भगवान कहते हैं

अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना ।

अपना चित्त अन्यगामी न करो, अभ्यासरूप योग से युक्त होकर अनन्यगामी करो, ईश्वरगामी करो ।

परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन् ।। (गीताः 8.8)

शास्त्र और ब्रह्मवेत्ता सद्गुरु के उपदेशानुसार चिंतन-ध्यान करते हुए परम पुरुष ब्रह्म-परमात्मा को प्राप्त हो जाय ऐसा अपना चित्त बनाओ ।

महर्षि वसिष्ठजी कहते हैं- ″हे राम जी ! जिनको भोगों की सदा इच्छा रहती है वे नीच पशु हैं, उनका संसार से उबरना कठिन है क्योंकि उनके हृदय में सदा तृष्णा रहती है ।″

इन्दियाँ क्षुद्र हैं और उनसे भी क्षुद्र विषय हैं । जिनको भोगों की इच्छा है…. जो कुछ देख के, सुन के, सूँघ के, खा के, पहन के सुखी होना चाहते हैं वे नीच बुद्धि के हैं । वे दुःख प्राप्त करते हैं, तुच्छ प्राणी हैं ।

वसिष्ठजी बोलेः ″हे राम जी ! जिनका चित्त सदा स्त्री-पुत्र और धन में आसक्त है और इनकी जो इच्छा करते हैं, वे महामूर्ख और नीच हैं । उनको धिक्कार है !″

स्त्री, पुत्र, धन, शत्रु के चिंतन में जिनका चित्त डाँवाडोल हो रहा है वे अपना कीमती आयुष्य नाश की तरफ ले जा रहे हैं और नाश को प्राप्त होंगे, बार-बार जन्मेंगे मरेंगे । और जिनका चित्त अविनाशी ईश्वर की तरफ चलता है, वे सेवाकार्य में लगते हैं तो निष्काम कर्मयोग हो जाता है, सत्संग सुनते विचारते हैं तो ज्ञानयोग हो जाता है, ध्यान-भजन करते हैं तो भक्तियोग हो जाता है । इस प्रकार त्रय योग हो जाता है उनका । जो ईश्वर की तरफ नहीं चलते वे काम धंधा करते हैं तो बंधन हो जाता है उनका वह कर्म । ऐसे तो सेवा भी कर्म है और बाजार में काम-धंधा भी कर्म है परंतु वह ममता और आसक्ति युक्त काम-धंधेवाला कर्म बंधन करता है । काम-धंधेवाला भी रोटी खाता है, सेवावाला भी रोटी खाता है पर सेवा के कर्म की कर्मयोग में गिनती हो जाती है और पहला बेचारा बंधन में चला जाता है ।

आत्मसाक्षात्कार या परम पद से बड़ा कोई पद नहीं । जिसको आत्मसुख, आत्मवैभव, परम पद की इच्छा हो उसको सदा संतों का संग करना चाहिए ।

नाटक कम्पनी का प्रबंधक अभिनेता को बोलता हैः ″देख, सेठजी ने तो आज तेरे को राजा का किरदार दिया !″

वह बोलाः ″अरे राजा का किरदार दिया तो क्या हुआ ! मेरी पगार बढ़ाओ, नहीं तो मैं जाता हूँ ।″

तो नाटक में राजा बन गया, इससे उसको कुछ नहीं । उसको तो पगार बढ़नी चाहिए । नाटक को नाटक समझता है न वह ! नाटक का राजा क्या मायना रखता है ! नाटक का भिखारी क्या मायना रखता है ! ऐसे ही इस संसार का हाल है । संसार की सफलता-विफलता कोई मायना नहीं रखती आत्मवैभव के आगे ।

एक के पीछे शून्य रखो तो कितने होते हैं ? 10. जितने ज्यादा शून्य रखो उतना आँकड़ा बढ़ता जायेगा । अच्छा, तो कितना भी बड़ा आँकड़ा हुआ, अब ‘1’ हटा दो फिर शून्यों की क्या कीमत है ? कोई कीमत नहीं । ऐसी ही है यह माया । एक चैतन्य है चिद्घन, बाकी सब शून्य माया के हैं । चैतन्य के ही सहारे सब दिखता है ।

इक्के ते सब होत है, सब ते एक न होई ।

उस एक से सब हो सकता है लेकिन सब मिलकर भी उस एक को नहीं बना सकते ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2020, पृष्ठ संख्या 28,29 अंक 336

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