Monthly Archives: November 2014

बस भूल हटा दी कि आनंद


सम्पूर्ण विषयों में जो व्यापक है, सब विषयों का जो प्रकाशक, ग्रहण करने वाला है, सब विषयों को जो अपने में समेट लेता है (खा जाता है) और जिसका भाव सदा बना रहता है, उसको आत्मा कहते हैं। ये चारों बातें अपने (आत्मा) में हैं और यह आत्मा आनंदस्वरूप ही है।

जहाँ अपने से भिन्न आनंद लेना होता है वहाँ तो करण की, इन्द्रियों की जरूरत होती है परंतु स्वरूपभूत आनंद के आस्वादन के लिए किसी करण की जरूरत नहीं है। शांत, विक्षिप्त, सविषयक, निर्विषयक आदि वृत्तियों की भी जरूरत नहीं है। सब वृत्तियों का प्रकाशक आत्मा ही है। अतः आत्मानंद करण-सापेक्ष नहीं है। अतः उसके लिए प्रयत्न की भी जरूरत नहीं है।

ऐसे आत्मा में दुःख और बंधन केवल अज्ञान से, भूल से हैं। आत्मा की भूल से नहीं, मनुष्य की भूल से। यह मनुष्य की देह में अभिमान करने वाला अज्ञानी हो गया है। वह अपनी भूल भ्रम दूर कर दे तो स्वयं आनंदस्वरूप ही है।

ये रोग,  अभाव, मौत मुझसे भिन्न कुछ हैं और ये मेरा कुछ नष्ट कर सकते हैं या कर रहे हैं – यह अपने से भिन्न कुछ मानना भ्रम है। यह द्वैत प्रपंच है। इसका उपशम (निराकरण) होना चाहिए। सारे साधनमात्र इसी के लिए हैं। अपने स्वरूप निर्माण के लिए साधन नहीं है। उपशम होते ही स्वस्थता प्राप्त हो जायेगी। अतः वेदान्त- विद्या का प्रयोजन अपने स्वरूप का अद्वैत-बोध ही है। प्रपंच का उपशम कर्म, उपासना, योग आदि साधनों से नहीं हो सकता क्योंकि द्वैत प्रपंच अविद्या की कृति है, अतः ब्रह्म विद्या से ही इसका उपशम होगा।

स्रोतः ऋषि प्रसाद नवम्बर 2014, पृष्ठ संख्या 13, अंक 263

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निंदक का भल नाहीं…. – संत कबीर जी


हंसा निंदक का भल नाही।

निंदक के तो दान पुण्य व्रत,

सब प्रकार मिट जाहीं।। टेक।।

‘हे विवेकियो ! निंदक का कल्याण नहीं है। निंदक द्वारा किये गये दान, पुण्य, व्रत आदि सब निष्फल ही हो जाते हैं।’

जा मुख निंदा करे संत की,

ता मुख जम की छाँही।

मज्जा रूधिर चले निशिवासर,

कृमि कुबास तन माँही।।1।।

‘जिस मुख से संत की निंदा की जाती है वह तो मानो यमराज की छाया में ही है। उसके मुख से मज्जा, रक्त आदि गंदी वस्तुएँ ही रात-दिन बहती हैं और उस व्यक्ति में दुर्गुणों के कीड़े किलबिलाते हैं। उससे कुप्रभाव की दुर्गंध आती है।’

शोक मोह दुःख कबहुँ न छूटे,

रस तजि निरधिन खाहीं।

विपत विपात पड़े बहु पीड़ा,

भवसागर बहि जाहीं।।2।।

‘जो सत्य, प्रिय वचनरूपी मीठा रस छोड़कर घृणित परनिंदा का आहार करता है, उसके जीवन से दुःख, मोह, शोक कभी नहीं छूटते। उस पर बार-बार विपत्ती पड़ती है, उसका पतन एवं विनाश होता है। उसके ऊपर दुःखों के पहाड़ टूटते हैं। वह रात-दिन मलिनता एवं भवसागर में बहता है।’

निंदक का रक्षण कोई नाहीं,

फिर फिर तन मन डाहीं।

गुरु द्रोही साधुन को निंदक,

नर्क माँहि बिलखाहीं।।3।।

‘निंदक का कोई रक्षक नहीं होता। उसके तन-मन सदैव जलते रहते हैं। जो गुरुद्रोही है, साधु संतों की निंदा करने वाला है, वह जीते जी मन की अशांति रूपी नारकीय जीवन सहज में प्राप्त कर लेता है और मृत्यु के बाद घोर नरकों में पड़ा बिलखता रहता है।’

जेहि निंदे सो देह हमारी,

जो निंदे को काही।

निंदक निंदा करि पछितावै,

साधु न मन में लाहीं।।4।।

‘विवेकवान समझते हैं कि यदि कोई हमारी निंदा करता है तो वह हमारे अपने माने गये शारीरिक नाम-रूप की ही निंदा कर रहा है, मुझ शुद्ध चेतन में उसका कोई विकार नहीं आ सकता। जो निंदा करता है वह कौन है और वह किसकी निंदा करता है, इसका उसे पता नहीं है। वह यदि अपने देहातीत आत्मस्वरूप को समझ ले तो न दूसरे की निंदा करेगा और अपनी निंदा पाकर दुःखी होगा। निंदक को निंदा करके अंत में केवल पश्चाताप ही हाथ लगता है लेकिन सज्जन तथा साधु निंदक की बातों को अपने मन पर ही नहीं लाते हैं।’

दया धरम संतोष समावै,

क्षमा शील जेहि माँहि।

कहैं कबीर सोइ साधु कहावै,

सतगुरु संग रहाहीं।।5।।

‘जिनमें दया है, धर्माचरण है, जो संतोष में लीन हैं, जिनमें क्षमा और शील विराजते हैं, संत कबीर जी कहते हैं के वे साधु एवं उत्तम मनुष्य कहलाते हैं। वे सदैव सदगुरु के उपदेशों के अनुसार चलते हैं।’

स्रोतः ऋषि प्रसाद, नवम्बर 2014, पृष्ठ संख्या 22, अंक 263

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जनता में जागृति की जरूरत है


श्री बी. एम. गुप्ता, वरिष्ठ अधिवक्ता

पुलिस को अधिकार दिये गये हैं, पुलिस उनका उपयोग भी कर सकती है, दुरुपयोग भी कर सकती है। अगर कोई भी शिकायत किसी अच्छे आदमी के खिलाफ दाखिल होती है तो पहले पुलिस को जाँच करनी चाहिए कि क्या यह आरोप सही है ? बिना किसी जाँच के पुलिस आदमी को उठा लेती है, यह कानून नहीं है।

आरोपकर्ता तथाकथित घटना जोधपुर की बताते हैं। जोधपुर से लड़की अपने गाँव (शाहजहाँपुर, उ.प्र.) जाती है, 2-3 दिन के बाद दिल्ली आती है और वहाँ सारा प्लान तैयार होता है। दिल्ली के कमला मार्केट थाने में 5 दिन बाद फरियाद दाखिल होती है। लेट होने का क्या कारण है ? पुलिस का फर्ज है जाँच करना लेकिन एक बार शिकायत दर्ज हो गयी तो चलो उठा लो, चाहे कोई भी हो, यह कानून नहीं कहता है। सर्वोच्च न्यायालय ने निरंजन सिंह केस के फैसले में यह कहा है कि पुलिस को गिरफ्तार करने के अधिकार हैं लेकिन उनके उपयोग का ठोस कारण चाहिए, अभियुक्त के खिलाफ तथ्यात्मक सबूत चाहिए। 12 साल बाद सूरत में एफआईआर दर्ज होती है। आज तक मैंने यह नहीं देखा-सुना कि 12 साल के बाद कोई अपराध दर्ज हो। सूरत के पुलिस कमिश्नर राकेश अस्थाना ने क्यों नहीं कहा कि ‘यह अहमदाबाद पुलिस स्टेशन की शिकायत है। जाओ, मैं फोन करता हूँ, वहाँ फरियाद लिखवाओ।

नारायण साँईं और आश्रम के खिलाफ गलत प्रचार करने के लिए इन्होंने दूसरे ग्राउंडस (आधार) खड़े किये हैं। पहला, न्यायाधीशों को रिश्वत देने का प्रयास किया। क्या किसी न्यायाधीश ने यह कहा है कि ‘हाँ, हमारे को प्रस्ताव दिया गया था ?’ दूसरा, डॉक्टरों को पैसे खिलाने का। 12 साल के बाद रेप का कोई सबूत महिला पर या पुरुष के पास से मिलेगा ? डॉक्टरों को कोई रिश्वत क्यों देगा ! उसके सबूत क्या हैं ? कहा गया कि इकबाल नाम के आदमी को डॉक्टरों को प्रस्ताव रखने के लिए माध्यम बनाया गया। उसका बयान जब पुलिस ने लिया तो उसने कहा कि “मैंने किसी डॉक्टर से बात नहीं की।” सूरत हॉस्पिटल के एक पुरुष नर्स का बयान पुलिस लेती है, वह भी कहता है कि “मैंने किसी से सिफारिश नहीं की।” तो डॉक्टरों को रिश्वत का कारण कहाँ से खड़ा हुआ ?

तीसरा कारण जेल में जेलरों को रिश्वत देने की बात है, जिससे साँईंजी को ज्यादा सुविधा मिले। मानवाधिकार आयोग ने कैदियों को इतनी सारी सुविधाएँ दी हैं कि उनको एक रूपया किसी को देने की जरूरत नहीं पड़ती। ये सभी बोगस कारण खड़े करके एक ‘प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट’ का केस खड़ा किया।

इसके अलावा पुलिस साइंटिफिक इन्वेस्टिगेशन (वैज्ञानिक जाँच) क्यों नहीं करती ? फुट प्रिंट, फिंगर प्रिंट, एक्स रे, विडियोग्राफी ये सब चीजें क्यों नहीं पुलिस उपयोग में लेती ? क्योंकि इनमें पुलिस गलत नहीं कर सकती। गवाह खड़े करना कोई बड़ी बात नहीं है ! आज हर इन्सान के शत-प्रतिशत लोग हितेच्छु नहीं होते, करोड़ों लोगों में 10-20 भी अगर विरोधी हैं और गवाह बन गये तो क्या करोड़ों लोग गलत हैं ?

5-5, 10-10 साल आदमी जेल में पड़ा रहने के बाद जब वह निर्दोष छूट जाये तो उसके परिवार का 10 साल में क्या हुआ – यह कभी किसी ने सोचा ? जनता में जागृति की जरूरत है। केशवानंद जी की मेडिकल रिपोर्ट में उन्हें क्लीन चिट मिल चुकी थी फिर भी 7 साल जेल में रहे और 7 साल बाद उनकी अपील की सुनवाई हुई और उनको निर्दोष मुक्त कर दिया गया। तो ये 7 साल जो केशवानंद जी के जेल में गये, उसका जिम्मेदार कौन है ? षडयन्त्रकारी क्या मुआवजा देंगे ?

स्रोतः ऋषि प्रसाद, नवम्बर 2014, पृष्ठ संख्या 7, अंक 263

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